Practice Of Brahmacharya Book [Hindi]
मानव जीवन का सबसे बड़ा संघर्ष है। इंद्रियों पर नियंत्रण। यही वह द्वार है। जहाँ से व्यक्ति या तो अधोगति की ओर बढ़ता है। या आत्मोन्नति की ओर। वासना, जो प्रारंभ में आकर्षक लगती है, धीरे-धीरे व्यक्ति की बुद्धि, शक्ति और पवित्रता को निगल जाती है। यह मनुष्य को पशुता की ओर ले जाती है, जबकि ब्रह्मचर्य उसे दिव्यता की ओर उठाता है। जब व्यक्ति ब्रह्मचर्य में स्थिर होता है, तब उसके भीतर एक देव आभा जन्म लेती है। उसका चेहरा तेजस्वी, वाणी मधुर और हृदय शुद्ध हो जाता है। वह किसी बाहरी शक्ति पर नहीं, ब्लकि अपनी आंतरिक शक्ति पर निर्भर रहता है। वह संसार में रहते हुए भी संसार से ऊपर होता है। ब्रह्मचर्य जीवन की वह नींव है। जिस पर ज्ञान, शक्ति और चरित्र का भवन खड़ा होता है।
आज के समय में ब्रह्मचर्य पहले से कहीं ज़्यादा ज़रूरी है। क्योंकि आज का युवा बाहरी चमक - धमक में उलझकर अपनी असल शक्ति को बर्बाद कर रहा है। आज देश के लाखों नहीं,करोड़ों-करोड़ों युवा पीढ़ी पाश्चात्य भोगवादी देश की नकल से बर्बाद हो रहीं है। आज का समय भोग-प्रधान हो चुका है। हर स्क्रीन पर ,मोबाइल, टीवी, वेब सीरीज , विज्ञापन और वेबसाइटों पर कामवासना भड़काने वाले दृश्य ज़्यादा दिखाए जाते है। और नतीजा शरीर कमजोर, मन बेचैन और ऊर्जा थकान मे बदल रहीं है।
यौवनकाल मे जिसकी ऊर्जा व्यर्थ नष्ट होती है। उनके लिए कोई महान कार्य करना सम्भव नहीं होता है। केवल सदाचारी एवं संयमी व्यक्ति ही जीवन के प्रत्येक क्षेत्र मे सफलता प्राप्त कर सकता है। ब्रह्मचर्य में अपार शक्ति है। इस शक्ति के बल पर असंम्भव कार्य भी संम्भव हो जाते हैं।